6.5 लाख रजिस्ट्रियां, पांच दिन में मंजूरी और स्टांप ड्यूटी राजस्व में 9.10 प्रतिशत की वृद्वि हुई
Metro Plus से Naveen Gupta की रिपोर्ट
Chandigarh 30 सितंबर: हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के आदेशानुसार प्रोपर्टी रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को पेपरलेस करने के सरकार के फैसले का बड़ा असर नजर आ रहा है। प्रोपर्टी रजिस्ट्रेशन के डिजिटल होने, 140 प्रकार की डीड के लिए एसओपी तैयार करने तथा बिचौलियों की भूमिका समाप्त होने से संपत्ति पंजीकरण के क्षेत्र में नई व्यवस्था कायम हुई है। इन व्यापक सुधारों के चलते राज्य का स्टांप ड्यूटी राजस्व हर वर्ष लगभग 9 से 10 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है।
हरियाणा की राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग की वित्तायुक्त डॉ. सुमिता मिश्रा ने बताया कि ये सुधार इस बात का प्रमाण हैं कि अधिक सरल, पारदर्शी और नागरिक-केंद्रित प्रशासन को मजबूत राजस्व वृद्वि के साथ जोड़ा जा सकता है। उन्होंने कर छूट और प्रोत्साहनों की पूरी व्यवस्था की नए सिरे से समीक्षा करने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि ऐसी रियायतें स्पष्ट नीतिगत उद्देश्यों से जुड़ी होनी चाहिए, इनसे वास्तविक आर्थिक लाभ मिलना चाहिए और अंतत: समय के साथ कर राजस्व में वृद्वि होनी चाहिए।
डॉ. सुमिता मिश्रा हरियाणा के अपने कर राजस्व को मजबूत करने व विकसित हरियाणा 2047 के लिए कर संरचना और विश्लेषण-संचालित कर प्रशासन में सुधार विषय पर आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित कर रही थीं। उन्होंने हरियाणा में संपत्ति पंजीकरण व्यवस्था में किए गए व्यापक बदलावों का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य उस पुरानी व्यवस्था से आगे निकल चुका है, जिसमें नागरिकों को बार-बार तहसीलों के चक्कर लगाने पड़ते थे और स्टांप वेंडरों, डीड राइटरों, वकीलों तथा अन्य बिचौलियों पर निर्भर रहना पड़ता था। उन्होंने कहा कि हमने इन सभी प्रक्रियाओं को सरल बना दिया है।
डॉ. मिश्रा ने बताया कि पंजीकरण के लिए करीब 140 प्रकार की डीड के मानकीकृत प्रारूप तैयार किए गए हैं। साथ ही डिजिटल हस्ताक्षर, सुरक्षित प्रमाणीकरण और आधार से जुड़ी प्रक्रियाओं को भी व्यवस्था में शामिल किया गया है। उन्होंने कहा कि नागरिक चाहें तो इनमें से किसी भी बिचौलिए की सहायता लिए बिना स्वयं प्रक्रिया पूरी कर सकते हैं। नागरिकों को केवल अपना विवरण दर्ज कर दस्तावेज ऑनलाइन प्रस्तुत करना होता है, जिसके बाद राजस्व अधिकारियों द्वारा निर्धारित समय-सीमा के भीतर दस्तावेजों की जांच कर उन्हें वापस किया जाता है। उन्होंने कहा कि नए पेपरलेस रजिस्ट्रेशन सिस्टम के लॉन्च होने के बाद से अब तक 6.5 लाख से ज्यादा रजिस्ट्री की जा चुकी हैं।
उन्होंने बताया कि नई प्रणाली में ऐसी सुरक्षा व्यवस्था भी की गई है जिससे फाइलों को बार-बार सुधार के लिए वापस न भेजा जा सके। अधिकारियों को किसी डीड को अधिकतम दो बार ही वापस करने की अनुमति है। उन्होंने कहा कि हमने प्रक्रियाओं को बेहद सरल और पारदर्शी बनाया है।
डॉ. मिश्रा ने विशेष रूप से कहा कि प्रक्रियाओं को सरल और सुव्यवस्थित करने से सरकारी राजस्व पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा है। उन्होंने कहा कि हरियाणा में स्टांप ड्यूटी राजस्व लगातार बढ़ रहा है और हर वर्ष इसमें 9 से 10 प्रतिशत की वृद्वि हो रही है। कर नीति पर चर्चा करते हुए डॉ. मिश्रा ने कहा कि कर छूट, प्रोत्साहन और रियायतों की पूरी व्यवस्था की बिना किसी पूर्वाग्रह के समीक्षा करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि यह देखना जरूरी है कि कौन सी व्यवस्था वास्तव में प्रभावी है और कौन सी नहीं।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक कर रियायत को स्पष्ट रूप से चिन्हित सार्वजनिक नीति के उद्देश्य से जोडऩा चाहिए। उन्होंने हरित विनिर्माण और सर्कुलर इकोनॉमी को ऐसे महत्वपूर्ण क्षेत्र बताया जहां सरकारें लक्षित एवं प्रभावी प्रोत्साहनों का इस्तेमाल कर सकती हैं। उन्होंने हरियाणा की नई औद्योगिक नीति का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें विनिर्माण, लॉजिस्टिक्स, सप्लाई चेन और सतत विकास जैसे क्षेत्रों को शामिल किया गया है।
डॉ. मिश्रा ने कहा कि कर रियायतों के वित्तीय प्रभाव को राजस्व नियोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि मध्यम अवधि में हमारा लक्ष्य यह होना चाहिए कि इसका परिणाम कर राजस्व में वृद्वि के रूप में सामने आए। यदि कोई रियायत प्रभावी है तो मध्यम अवधि में उससे अधिक राजस्व प्राप्त होना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रोत्साहनों से अल्पावधि में राजस्व में कुछ कमी आ सकती है लेकिन यदि वे अपेक्षित निवेश आकर्षित करने में सफल होते हैं तो लंबे समय में सरकार के लिए राजस्व के रूप में इसका लाभ मिलना चाहिए।
डॉ. मिश्रा ने कर व्यवस्था में स्थिरता और पूर्वानुमान के महत्व पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि कारोबारी दीर्घकालिक योजनाएं बनाने के लिए कर व्यवस्था में निश्चितता चाहते हैं। जितनी अधिक स्थिरता होगी, उतनी ही बेहतर कारोबारी योजनाएं बनेंगी। किसी भी कर व्यवस्था में बार-बार बदलाव करना सबसे खराब चीजों में से एक है। उन्होंने सुझाव दिया कि जब बदलाव आवश्यक हों तो उन्हें बार-बार अलग-अलग करने के बजाय बजट के आसपास एक साथ किया जाना चाहिए।
जीएसटी लागू होने के बाद की अवधि में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की वरिष्ठ सलाहकार के रूप में अपने अनुभव का उल्लेख करते हुए डॉ. मिश्रा ने कहा कि छोटे कारोबारियों, बड़ी कंपनियों, चार्टर्ड अकाउंटेंट्स, कर सलाहकार फर्मों और अन्य हितधारकों के साथ हुई चर्चाओं में दो प्रमुख चिंताएं सामने आई थीं-जटिलता और लगातार बदलाव। उन्होंने कहा कि फीडबैक के आधार पर नीतियों में सुधार करना महत्वपूर्ण है लेकिन सुधारों को एक-एक करके लागू करने के बजाय उन्हें एक पैकेज के रूप में लागू करना अधिक प्रभावी होगा। उन्होंने सुझाव दिया कि पांच बदलाव एक पैकेज में करें, पांच सप्ताह में पांच अलग-अलग बदलाव न करें।
डॉ. मिश्रा ने कहा कि प्रशासनिक सुधारों का उद्देश्य केवल करों की कुशल वसूली तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि नियमों का पालन करने में नागरिकों को होने वाली लागत और जटिलताओं को भी कम करना चाहिए। उन्होंने चेताया कि किसी प्रक्रिया को केवल डिजिटल बना देना उसे अपने आप नागरिक अनुकूल नहीं बनाता। उन्होंने कहा कि डिजिटल व्यवस्था के बावजूद कई कर फॉर्म इतने जटिल हैं कि छोटे कारोबारियों और आम नागरिकों को अनुपालन और रिटर्न दाखिल करने के लिए पेशेवरों की मदद लेनी पड़ेती है।
उन्होंने कहा कि सरकारों के सामने वास्तविक चुनौती यह है कि वे अपनी व्यवस्थाओं को आम नागरिक की नजर से देखें। डॉ. मिश्रा ने कहा कि सरकारों के लिए नागरिक की तरह सोच पाना एक बहुत बड़ी चुनौती है। उन्होंने कहा कि हरियाणा की संपत्ति पंजीकरण व्यवस्था में किए गए सुधार प्रशासनिक सुधारों के लिए आगे का रास्ता दिखाते हैं। बिचौलियों को हटाना, प्रक्रियाओं को सरल बनाना, पारदर्शिता बढ़ाना और समयबद्व सेवाएं सुनिश्चित
करना-इन सभी सुधारों को इस तरह लागू किया गया है कि सरकारी राजस्व को भी सुरक्षित रखा जा सके और उसमें निरंतर वृद्वि हो।






