सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों अनुसार राज्यसभा चुनाव में मतदान सदन की आंतरिक कार्रवाई नहीं,
Metro Plus से Naveen Gupta की रिपोर्ट।
Chandigarh, 18 मार्च: हरियाणा में राज्यसभा चुनावों में भाजपा समर्थित निदर्लीय उम्मीदवार सतीश नांदल के पक्ष में कांग्रेसी विधायकों द्वारा वोट डालने पर प्रदेश की राजनीति में उबाल आ गया है। कोई कह रहा है कि विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने कांग्रेस के जिन 5 बागी विधायकों के नाम आलाकमान को भेजे हैं, उनकी विधायकी यानि विधानसभा की सदस्यता जा सकती है तो कह रहा है कि हरियाणा में उनकी विधायकी जाने के बाद कुछ विधानसभा सीटों पर उप-चुनाव भी हो सकता है।
यहां हम आपको साफ कर दें कि ऐसा कुछ नहीं है। ना तो बागी कांग्रेसी विधायकों की विधायकी यानि विधानसभा की सदस्यता जाएगी और ना ही हरियाणा में उप-चुनाव होंगे। हां, इतना जरूर है कि इन 5 बागी कांग्रेसी विधायकों को कांग्रेस नेतृत्व अनुशासनात्मक कार्यवाही के नाम पर पार्टी से निलंबित या निष्कासित तो कर सकता है, विधायकी नहीं छिन सकता, इनकी विधायकी बरकरार रहेगी। सिर्फ दल बदलने पर दल-बदल कानून के तहत ही किसी विधायक की विधानसभा सदस्यता जा सकती है, या फिर इस्तीफा देने और किसी मामले में अदालत द्वारा तीन साल से ज्यादा की सजा होने पर।
इसे और सरल शब्दों में ऐसे कहा जा सकता है कि जैसे अब कांग्रेस के 5 बागी विधायकों ने अपने-अपने पार्टी उम्मीदवार को अपनी पहली प्राथमिकता का वोट न देकर निर्दलीय सतीश नांदल को दिया है तो उनके ऐसे बगावती आचरण के विरूद्व कांग्रेस हाईकमान (पार्टी नेतृत्व) उनके खिलाफ पार्टी संविधान के अनुसार अनुशासनात्मक कार्रवाई तो कर सकता है अर्थात उन्हें पार्टी से निलंबित या निष्कासित तो किया जा सकता है परन्तु भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची में दिए दल-बदल विरोधी प्रावधानों के अंतर्गत उनकी विधानसभा की सदस्यता (विधायकी) से अयोग्य घोषित करने के लिए विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष अर्जी दायर नहीं कर सकता।
जून-2022 में भी इसी प्रकार कांग्रेस हाईकमान द्वारा आदमपुर से तत्कालीन कांग्रेस विधायक कुलदीप बिश्नोई द्वारा पार्टी उम्मीदवार अजय माकन की बजाए निर्दलीय कार्तिकेय शर्मा के पक्ष में वोट देने के फलस्वरूप उनके विरूद्व पार्टी द्वारा कड़ी कार्रवाई करते हुए उन्हें कांग्रेस कार्यसमिति के विशेष आमंत्रित सदस्य सहित सभी पार्टी पदों से तत्काल प्रभाव से हटा दिया गया था। हालांकि उसके दो महीने बाद अगस्त, 2022 में कुलदीप स्वयं कांग्रेस पार्टी छोडक़र भाजपा में शामिल हो गये थे। इसी प्रकार यदि राज्यसभा चुनावों में उक्त पांचों बागी कांग्रेसी विधायकों को पार्टी से निकालती है तो वे भी कुलदीप बिश्रोई की तरह भाजपा में शामिल हो सकते हैं।
बता दें कि हरियाणा से राज्यसभा की 2 सीटों के निर्वाचन हेतु करवाए गये मतदान में भाजपा के उम्मीदवार संजय भाटिया और कांग्रेस प्रत्याशी कर्मवीर सिंह बौद्व दोनों निर्वाचित घोषित किये गए, वहीं निर्दलीय के तौर पर चुनाव लड़ सतीश नांदल जो हरियाणा भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष हैं, बहुत कम अंतर से कर्मवीर से पिछडऩे के कारण चुनाव हार गए। बहरहाल, मतगणना के बाद यह निकल कर सामने आया कि मतदान में भाजपा के एक और कांग्रेस के 4 विधायकों के वोट तकनीकी कारणों से इनवैलिड (रद्द) हो गये जबकि 5 कांग्रेस विधायकों ने क्रॉस वोट किया अर्थात उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार कर्मवीर को अपनी पहली प्राथमिकता का वोट न देकर निर्दलीय सतीश नांदल को दिया। कांग्रेस पार्टी के हरियाणा विधानसभा में 37 विधायक होने बावजूद पार्टी प्रत्याशी को 28 वोट ही प्राप्त हो सके। हालांकि अभी तक कांग्रेस पार्टी द्वारा क्रॉस वोटिंग करने वाले 5 बागी विधायकों और 4 विधायकों जिनके वोट रद्द हुए, उनके नाम आधिकारिक तौर पर सार्वजनिक नहीं किये गये हैं।
इसी बीच पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के एडवोकेट और संवैधानिक मामलों के जानकार हेमंत कुमार ने बताया कि न केवल भारतीय संविधान के प्रासंगिक प्रावधानों के अनुसार बल्कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गये निर्णयों के अनुसार इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं कि राज्यसभा चुनाव के लिए मतदान विधानसभा सदन (हाउस) की आंतरिक प्रक्रिया नहीं होती अर्थात इस चुनाव में कोई भी राजनीतिक दल अपने विधायकों को न पार्टी द्वारा आधिकारिक/प्रत्यक्ष तौर पर चुनाव में उतारे गये उम्मीदवार बल्कि परोक्ष रूप से समर्थित उम्मीदवार के पक्ष में वोट डालने के लिए भी व्हिप (निर्देश) जारी नहीं कर सकता है।
दूसरे शब्दों में कहा जाए तो भाजपा हाईकमान हरियाणा में अपने 48 विधायकों को पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार संजय भाटिया और परोक्ष रूप से समर्थित निदर्लीय प्रत्याशी सतीश नांदल के पक्ष में मतदान के लिए और इसी प्रकार कांग्रेस हाईकमान प्रदेश में अपने 37 विधायकों को पार्टी उम्मीदवार कर्मवीर सिंह बौद्व के पक्ष में वोट डालने के लिए आधिकारिक और औपचारिक तौर पर पार्टी व्हिप नहीं जारी कर सकती थी।
इसी प्रकार इनेलो पार्टी भी मतदान में शामिल होने या न होने के लिए अपने दोनों विधायकों को निर्देश नहीं दे सकती थी। हालांकि राजनीतिक पार्टियों द्वारा लिखित तौर पर ऐसा निर्देश न देकर मौखिक तौर पर ऐसा अवश्य किया जाता है। जो भी हो, पार्टी विधायक अपनी स्वेच्छा और विवेकाधिकार से राज्यसभा चुनाव में मतदान करने अर्थात किसके पक्ष में करने, मतदान में भाग न लेने और यहां तक कि मतदान में शामिल होकर अपनी वोट जानबूझ कर गलत ढंग से डालकर अर्थात उसे रिजेक्ट/रद्द करवाने तक के लिए लिए पूर्णतया और कानूनन स्वतंत्र हैं।
बकौल हेमंत, वो आज तक समझ नहीं पाए कि जब राज्यसभा चुनाव में पार्टी विधायक अपनी पार्टी के ही उम्मीदवार के पक्ष में वोट डालने के लिए बाध्य ही नहीं है तो फिर वर्ष 2003 में केंद्र की तत्कालीन एनडीए सरकार के दौरान संसद द्वारा लोक प्रतिनिधित्व कानून,1951 में संशोधन मार्फत राज्यसभा चुनाव में विधायकों द्वारा ओपन बैलट से मतदान करने की कानूनी व्यवस्था क्यों लागू की गयी थी जिससे यह प्रावधान किया गया था? ऐसे चुनाव में मतदान से पूर्व हर उस राजनीतिक दल पार्टी के दो वरिष्ठ नेताओं/पदाधिकारियों को अधिकृत एजेंट के रूप में नियुक्त करेगा जिनका कार्य यह सुनिश्चित करना होगा कि उनकी पार्टी विधायकों ने राज्यसभा चुनाव में मतदान के दौरान किसको वोट डाला है, यह अपने आप में विरोधाभास है।





