Metro Plus से Naveen Gupta की रिपोर्ट।
Faridabad, 16 अप्रैल: भारत अपने लोकतांत्रिक इतिहास के एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ा है, जहां समानता, सहभागिता और सामाजिक न्याय के संकल्प को वास्तविक रूप देने की दिशा में ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण सुनिश्चित करने की पहल केवल एक विधायी परिवर्तन नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक क्रांति का संकेत है, जो आने वाले समय में देश की राजनीति और नीति-निर्माण की दिशा तय करेगी।
दशकों से महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर चल रही बहस अब निर्णायक दौर में प्रवेश कर चुकी है। लंबे इंतजार, अनेक प्रयासों और व्यापक सहमति के बाद यह स्पष्ट होता जा रहा है कि अब देश की आधी आबादी को केवल दर्शक बनाकर नहीं रखा जा सकता। उन्हें निर्णय प्रक्रिया का केंद्र बनाना ही समय की सबसे बड़ी मांग है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में उठाया गया यह कदम 21वीं सदी के सबसे प्रभावशाली निर्णयों में गिना जा रहा है। यह पहल नारी शक्ति को समर्पित है और इसका उद्वेश्य महिलाओं को केवल भागीदारी नहीं, बल्कि नेतृत्व की भूमिका में स्थापित करना है। संसद और विधानसभाओं में उनकी बढ़ती उपस्थिति न केवल लोकतंत्र को मजबूती देगी, बल्कि निर्णयों में संवेदनशीलता और व्यापकता भी सुनिश्चित करेगी।
विपुल गोयल ने कहा कि महिलाओं की भागीदारी बढऩे से शासन की कार्यशैली में सकारात्मक बदलाव आता है, यह बात अब सिद्ध हो चुकी है। जब महिलाएं नीति निर्माण का हिस्सा बनती हैं, तो शिक्षा, स्वास्थ्य, जल प्रबंधन, पोषण और सामाजिक सुरक्षा जैसे विषयों पर अधिक गंभीरता और संवेदनशीलता के साथ काम होता है। यही कारण है कि महिला नेतृत्व को केवल अधिकार नहीं, बल्कि विकास का आधार माना जा रहा है।
इस दिशा में यह एक सुनहरा अवसर है कि आरक्षण के साथ महिलाओं के नेतृत्व को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया जाए। आज की नारी में अपार क्षमता, दृष्टि और नेतृत्व कौशल मौजूद है। जिसे सही मंच और सहयोग मिलने पर वह प्रभावी रूप से देश की दिशा तय कर सकती है। प्रशिक्षण, मार्गदर्शन और संस्थागत सहयोग के माध्यम से यह शक्ति और अधिक सशक्त बनेगी, जिससे महिलाएं आत्मविश्वास के साथ निर्णय प्रक्रिया का नेतृत्व करते हुए राष्ट्र निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाएंगी।
भारत में पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी इस दिशा में एक मजबूत आधार प्रस्तुत करती है। लाखों महिलाएं स्थानीय शासन में अपनी भूमिका निभा रही हैं और कई राज्यों में उनकी भागीदारी लगभग 40 से 50 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। यह अनुभव बताता है कि जब महिलाओं को अवसर मिलता है, तो वे न केवल जिम्मेदारी निभाती हैं, बल्कि व्यवस्थाओं को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह भी बनाती हैं।
विपुल गोयल ने कहा कि हरियाणा सहित कई राज्यों में महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में बीते वर्षों में उल्लेखनीय परिवर्तन देखने को मिले हैं। बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ जैसे अभियानों ने सामाजिक सोच को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अब यह बदलाव केवल शिक्षा और स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि महिलाओं को नेतृत्व के केंद्र में लाने की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है।
महिला सुरक्षा के क्षेत्र में भी हाल के वर्षों में कई ठोस पहल की गई हैं। कानूनी सुधार, त्वरित न्याय व्यवस्था और डिजिटल माध्यमों के जरिए शिकायत दर्ज करने की सुविधाओं ने महिलाओं को अधिक सुरक्षित और सशक्त बनाया है। एक सुरक्षित वातावरण ही महिलाओं को अपने सपनों को साकार करने का विश्वास देता है, और यही किसी भी प्रगतिशील समाज की पहचान होती है।
नारी शक्ति वंदन की यह पहल केवल एक कानून नहीं, बल्कि एक सोच है एक ऐसा दृष्टिकोण जो महिलाओं को बराबरी का अधिकार देने के साथ-साथ उन्हें राष्ट्र निर्माण की मुख्यधारा में स्थापित करता है। यह उन करोड़ों महिलाओं के सपनों को नई उड़ान देगा, जो अब तक सीमित अवसरों के बावजूद आगे बढऩे का प्रयास करती रही हैं। आने वाला समय इस बात का साक्षी बनेगा कि यह ऐतिहासिक कदम किस प्रकार भारत के लोकतंत्र को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाता है। जब महिलाएं संसद और विधानसभाओं में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराएंगी, तब निर्णयों में समाज के हर वर्ग की आवाज और अधिक प्रभावी ढंग से गूंजेगी।





